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बुधवार, 10 जून 2009

किताबें कुछ कहना चाहती हैं

सब की ज़िन्दगी से किताबों का अन्योन्याश्रित नाता है. किताबों में हमारे ख़्वाब भी रहते हैं और कुछ सूखे हुए गुलाब भी, और बहुत कुछ जिसे आसानी से नहीं कहा जा सकता. सफ़दर हाश्मी साहब की ये कविता आप तक पंहुचा रहा हूँ. किताबें और क्या - क्या कहना चाहतीं हैं समझने की कोशिश कीजिए.
किताबें
करती हैं बातें
बीते ज़मानों की
दुनिया की, इंसानों की
आज की, कल की
एक एक पल की
खुशियों की, ग़मों की
फूलों की, बमों की
जीत की, हार की
प्यार की, मार की
क्या तुम नहीं सुनोगे
किताबों की बातें ?
किताबें कुछ कहना चाहती हैं
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं
किताबों में चिडियां चहचहाती हैं
किताबों में खेतियां लहलहाती हैं
किताबों में झरने गुनगुनाते हैं
परियों के किस्से सुनाते हैं
किताबों में रोकिट का राज़ है
किताबों में साइंस की आवाज़ है
किताबों का कितना बड़ा संसार है
किताबों में ज्ञान की भरमार है
क्या तुम इस संसार में
नहीं जाना चाहोगे ?
किताबें कुछ कहना चाहतीं हैं
तुम्हारे पास रहना चाहतीं हैं

3 टिप्‍पणियां:

sidheshwer ने कहा…

बहुत बढ़िया साहब

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

ब्लागजगत में फिर नियमित होने पर बधाई।

चलिये एक लाईब्रेरी बनाते हैं।

दिल दुखता है... ने कहा…

किताबें करती है साची बातें....
अच्छी कविता प्रकाशित करने के लिए धन्यवाद्.....