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गुरुवार, 7 मई 2009

'मां' चार कविताएँ

(एक)
मां !
क्या सूख गया है ?
तुम्हारे स्तनों का दूध
तुम्हारी आँखों का पानी
या तुम्हारी ममता
जो -
संकट के बादल घिर आये हैं !
(दो)
मां !
क्या नहीं है ?
वह झूला
वह रातें, वे परियां
या वह लोरी
जो, आखों से उड़ गयी है नींद ...!
(तीन)
मां !
यहाँ क्या छूटा है ?
बचपन, जीवन
कलियाँ, मधुवन
या मैं, या तुम
या समय
(चार)
मां !
मैं तुम्हारे पेट मैं रहा
या तुम मेरे पेट में हो
तुमने मुझे जन्म दिया
या मैं तुम्हें दाग देने वाला हूँ
- आशेन्द्र

4 टिप्‍पणियां:

RAJNISH PARIHAR ने कहा…

माँ शब्द ही अद्भुत है...मदर्स डे पर आपकी कविता बहुत पसंद आई...माँ के आगे संसार की तमाम चीज़ें कुछ भी महत्त्व नहीं रखती..

mahashakti ने कहा…

माँ अम्‍मा ये कोई शब्‍द नही है मंत्र है। गर कोई इसे ही दुहराते रहे तो ईश्‍वर ही मिल जायेगे।

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

भावुक कवितायें
माँ पर मेरी एक कविता देखिये।

http://asuvidha.blogspot.com/2009/03/blog-post.html

Thar Express ने कहा…

MA KE CHARNO ME SWARG HOTA HAI. MA KHUSH TO SARI DUNIYA KI KHSHI MIL JATI HAI.
L.K.CHHAJER
THAR EXPRESS